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Thursday, January 27, 2011

देश की पहली महिला न्यूज फोटोग्राफर होमोई व्यारावला को इस बार पदम सीरिज एवार्ड के लिए चुना गया



बिजेंदर शर्मा ---97 साल की उम्र पूरी कर चुकी होमोई ऎसी फोटोग्राफर हैं, जिन्होंने इतिहास को अपनी आंखों के सामने घटते हुए देखा है. आजादी से पहले के उनके फोटोग्राफ तबके उथल-पुथल भरे दौर के जीवंत दस्तावेज हैं. इनके फोटो से पता चलता है कि असल में आजादी के लिए हमें क्या कीमत चुकानी पड़ी है. गांधी जी की मौत के बाद उनके खींचे गए फोटो देख हर आंख नम हो उठी थी. हो ची मिन्ह, महारानी एलिजाबेथ और जैकी केनेडी जैसी जानी-मानी अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के दौरे के समय खींची गई तस्वीरें देखने वालों के दिलो-दिमाग में आधी सदी के करीब गुजर जाने के बाद भी ताजा हैं. दुनिया ने उनकी तस्वीरों के जरिए एक नए आजाद हुए मुल्क के आशावाद और उल्लास को जीवंत देखा. पर होमोई व्यारावला खुद कभी लाइम लाइट में नहीं रहीं. देश की आजादी की गोल्डन जुबली के अवसर पर उनकी उपलब्धियों को जरूर याद किया गया. उनके काम को याद करने के लिए एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई गई, जिसका सब टाइटल था 'ए टेलेंटिंड वूमेन हिस्ट्री फोरगोट'.
1940 और 1950 के दशक में दिल्ली के आसपास साड़ी में लिपटी होमोई व्यारावला को अक्सर साइकिल पर देखा जाता था. उसी दौरान उन्होंने इतिहास में अमर हो गए इवेंट और आम लोगों की ऎसी तस्वीरें खींचीं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता. अपने भारी-भरकम उपकरण वे खुद लादकर चलती थीं. वे कहती हैं- मैं सतर्कतापूर्वक एक कोने में खड़ी रहती थी और जैसे ही मौका आता, फोटो ले लेती. फोटोग्राफर अपने रूटीन के फोटोग्राफ लेने के बाद जल्दी ही चले जाते थे, लेकिन मैं हमेशा एक ऎसे फोटोग्राफ की तलाश में रहती, जो रूटीन से हटकर हो. फोटो जर्नलिज्म के शुरुआती दिनों के बारे में होमोई बताती हैं- उन दिनों फोटोग्राफी एक सम्मानित पेशा हुआ करता था. पंडित नेहरू तो होमोई के मनपसंद सब्जेक्ट थे.
होमोई को अपने काम में पति मानेकशॉ का पूरा सहयोग मिला. होमोई बाहर जाकर फोटो खींचतीं और मानेकशॉ उन्हें डवलप करते. 1938 में बॉम्बे क्रॉनिकल में अपनी खींची हुई आठ तस्वीरें छपने पर उन्हें एक रुपया मिलता था. बाद में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादक सेटेनली जेपसन ने व्यारावला को साप्ताहिक असाइनमेंट देने शुरू किए. उन्होंने युद्ध के दौरान बॉम्बे की हर एंगल से तस्वीरें खींची. कुछ ही दिन में उनका नाम पहचाना जाने लगा. 1942 में व्यारावला दिल्ली ब्रिटिश सूचना सेवा के फार इस्टर्न ब्यूरो के मुख्यालय दिल्ली आ गईं. यहां वे पूर्णकालिक कर्मचारी थीं, लेकिन ऑफिस के बाद उन्हें अन्य काम करने की इजाजत थी. अपनी ड्यूटी के बाद वे ब्रिटिश उच्चायोग की जिमखाना में होने वाली पार्टियों में जातीं. यहां उन्होंने ऑनलुकर, टाइम और लाइफ जैसी पत्रिकाओं के लिए मशहूर हस्तियों के फोटो लिए. वे बताती हैं कि उन्हें माउंटबेटन के एक फंक्शन को कवर करने का मौका मिला. उन्हें एक हाई एंगल शॉट की जरूरत लगी. इसके लिए वे एक मेज पर चढ गईं और फोटो लिए. शायद उन्हें महिला होने का लाभ मिला. व्यारावला न्यूज चेयरमैन एसोसिएशन की संस्थापक सदस्य हैं. होमोई का जन्म 1913 में गुजरात के नवसारी में हुआ था. उनके पिता उर्दू पारसी थिएटर के जाने-माने अभिनेता थे. 

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