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The Union Minister for Steel, Chemicals and Fertilisers, Mr Ram Vilas Paswan, enjoys Himachali food

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Monday, March 7, 2011

यह इंडिया और भारत के बीच संघर्ष का एक और उदाहरण है

नयी दिल्ली। ‘यह भारत और इंडिया के बीच संघर्ष है।’ दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले दिनों उस स्थिति का बखान कुछ इस तरह से किया जिसमें सीमा सुरक्षा बल प्रशासन ने एक कांस्टेबल को उसे मिले तलाक को स्वीकार नहीं करते हुए उसे एक पत्नी के रहते दूसरी शादी करने के आरोप में बर्खास्त कर दिया है।
हाईकोर्ट ने ‘प्रगतिशील’ नहीं होने के लिए बीएसएफ की आलोचना की जिसने कांस्टेबल शिवराम को पंचायत द्वारा दिलवाए गए तलाक को तकनीकी रूप से यह कहते हुए मानने से इनकार कर दिया था कि यह हिंदू विवाह अधिनियम के अनुरूप नहीं है।
अदालत ने कहा,’यह इंडिया और भारत के बीच संघर्ष का एक और उदाहरण है। ग्रामीण भारत में सामाजिक नियम उन बदलावों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं जिन्हें विधायिका बना रही है। न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग की अध्यक्षता वाली पीठ ने शिवराम की बहाली का आदेश देते हुए बीएसएफ को छह सप्ताह के भीतर अदालती आदेश की तामील करने को कहा है।
हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के रहने वाले शिवराम की शादी वर्ष 2000 में पड़ोसी गांव की एक लड़की से हुई थी। दोनों के बीच मतभेद उभरे और ग्राम पंचायत ने उन्हें अलग-अलग होने की अनुमति तथा साथ ही शिवराम को अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने को कहा।
बाद में शिवराम की पहली पत्नी ने दूसरी शादी कर ली और उसने भी दूसरी लड़की से विवाह कर लिया। लेकिन शिवराम के लिए परेशानी तब खड़ी हो गई जब उसकी दूसरी पत्नी तथा उसके माता-पिता ने बीएसएफ प्रशासन को शिकायत कर कहा कि शिवराम ने एक पत्नी के रहते दूसरी शादी की और उसका तलाक पंचायत ने मंजूर कराया था न कि कानून की अदालत ने।
बीएसएफ द्वारा बैठाई गई कोर्ट आफ इंक्वायरी ने उसके निलंबन का आदेश देने के साथ ही कहा कि भले ही उसकी दूसरी पत्नी पर शादी के लिए दबाव नहीं डाला गया लेकिन उसे अदालत से हासिल तलाक की डिक्री पेश करनी होगी क्योंकि पंचायत का आदेश वैध नहीं है।
लेकिन दूसरी कोर्ट आफ इंन्क्वायरी ने ‘तकनीकी’ पहलू को आधार बनाकर कहा कि अदालत में बाद में तलाक का आवेदन दाखिल करना यह साबित करता है कि यह बहुपत्नीक मामला है और उसने पहले विवाह के अस्तित्व में रहते दूसरी शादी की। इसके बाद जांच में उसके निलंबन के आदेश दे दिए गए।
पीठ ने कहा,’पहली कोर्ट आफ इन्क्वायरी का फैसला भारत में सामाजिक सचाइयों के समरूप था। कमांडेंट ने उसे स्वीकार कर सही कदम उठाया और याचिकाकर्ता को तकनीकी गलतियों को सुधारने को कहा। हमें कोई कारण नजर नहीं आता कि याचिकाकर्ता को क्यों परेशान किया जाए।’ पीठ ने आगे कहा,’दुर्भाग्य से विभाग ने पहली कोर्ट आफ इंन्क्वायरी के प्रगतिशील विचार को दरकिनार कर 

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