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Wednesday, March 9, 2011

तिब्बतियों के धर्मगुरू दलाई लामा ने भले ही अपनी रिटायरमेंट की घोषणा कर दी हो । लेकिन इस मामले पर अभी भी तस्वीर साफ नहीं


गौरव सोनी की धर्मशाला से रिपोर्ट 
 आज दुनिया भर में तिब्बती समाज तिब्बत की आजादी के संर्घषोत्सव के रूप में इस दिन को मना रहा है। हर साल दस मार्च का दिन तिब्बतियों के लिये खास मायने रखता है। आज एक बार फिर दलाई लामा नये संकल्प के साथ सामने आयेंगे। तिब्बतियों के धर्मगुरू दलाई लामा ने भले ही अपनी रिटायरमेंट की घोषणा कर दी हो । लेकिन इस मामले पर अभी भी तस्वीर साफ नहीं हो पा रही है। संशय तिब्बति समाज में भी बरकरार है। कि आखिर दलाई लामा मुख्यधारा से अलग हो जायेंगे कि नहीं। दरअसल ऐसी व्यवस्था करीब सात साल पहले ही आ गयी थी जब तिब्बत की निर्वासित सरकार में प्रधानमंत्री के तौर पर सोमदोंग रिन्पोचे की ताजपोशी हुई थी। उन्हें लोकतात्रिकं तरीके से चुना गया था। 
इन सात सालों में इसके बावजूद दलाई लामा ही पूरी तरह प्रभावी रहे हें। लेकिन अब  दलाई लामा ने कहा है कि तिब्बत के भविष्य की कमान निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री सोमदोंग रिन्पोचे के पास रहेगी।  दलाई लामा अब धार्मिक मामले ही देखेंगे। दलाई लामा ने बीते माह अपने विदेश प्रवास से पहले भी रिटायर होने की इच्छा जाहिर की थी। अब उन्होंने कहा है कि मैं बूढ़ा हो रहा हूं। लिहाजा मैं अपने लिये सेमि रिटायरमेंट ले रहा हूं । हालांकि दलाई लामा पूरी तरह तिब्बति अंदोलन से अपने आपको अलग करना चाहते हैं। दलाई लामा की इस घोषणा से देश दुनिया में खलबली मच गयी है। जिससे तमाम लोग अपने अपने तरह से आकलन कर रहे हैं।
तिब्बत के मसले पर कुछ माह पहले  मेक्लोडगंज में अधिवेश संपन्न हुआ । जिसमें तिब्बतियों के तमाम नेताओं ने एक सुर से दलाई लामा की मध्यमार्गी निति पर चलने की बात कही थी । दलाई लामा को चीन पिछले अरसे से परेशान है। आरोप प्रत्यारोप के बीच दलाई लामा को दुनिया भर से भरपूर समर्थन चीन के विरोध के बावजूद मिलता रहा है। हालांकि उनकी संहत में गिरावट भी आ रही है। 75 साल की उम्र में उन्हें सर्जरी करानी पड़ी है। दलाई लामा का कहना है कि चीन के साथ संवाद होगा कि नहीं इस बात को सोमदोंग रिन्पोचे ही तय करेंगे। दलाई लामा का मानना है कि उनकी पूरी तरह से रिटायरमेंट तिब्बत के अप्दोलन को मजबूती प्रदान करेगी। वह कहते हैं कि आखिर आप ही सोचें कि कब तक मैं तिब्बत के अन्दोलन को नेतृत्व दे सकता है।  तिब्बत पर 1959 में चीन के हमले के ल्हासा के पोटाला महल से भारत आते वक्त 25 वर्षीय अध्यात्मिक गुरू दलाईलामा ने एक सपना देखा था कि एक दिन वे तिब्बत को चीन के चंगुल से मुक्त कराकर  स्वदेश लौटेंगे ।
आज आज 50 वर्ष के बाद तिब्बतियों के सर्वोच्च धर्मगुरू की बूढ़ी होती आंखो में यह सपना अब ध्ुांधला पडऩे लगा है  । चीन सरकार के अढिय़ल रवैए के चलते दलाईलामा की स्वदेश लौटने की आस भी अब दम तोड़़ती प्रतीत हो रही है । यह सही है कि 1959 से पहले तिब्बत के अस्तित्व और इतिहास के बारे में विश्व समुदाय लगभग अनजान था तब तिब्बत को अंतराष्टï्रीय मान्यता भी प्राप्त नहीं थी, लेकिन यह भी सच्चाई है कि सदियों से तिब्बत एक स्वाधीन शांतिप्रिय देश था । जहां भारत के साथ तिब्बत के सांस्कृतिक , धार्मिक और वैचारिक संबंध थे  वहीं आर्थिक और व्यवसायिक जरूरतें पूरी करने के लिए तिब्बत चीन पर निर्भर था । इतिहास साक्षी है कि तिब्बत का आस्तित्व कई बार खतरे में पड़ा और चीनी शासकों ने कई बार इस देश पर कब्जा किया , लेकिन 20वीं शताब्दी के मध्य में यह एक स्वाधीन राष्टï्र था । चीन ने 1959 में एक जबरन संधि के तहत तिब्बत पर कब्जा करके दलाईलामा को देश छोडऩे के लिए मंजबूर कर दिया । सन् 1959 में भारत पहूंचने  के बाद कई जगहों पर विचार करने के बाद भारत सरकार ने दलाई लामा के लिए धर्मशाला के मैक्लोडग़ंज को चुना और उनके नए आवास का निर्माण पूरा होने तक उन्हें मौजूदा क्षेत्रीय पवर्तारोपण संस्थान के भवन में ठहराया गया । आवासीय परिसर बनने पर दलाईलामा वहां चले गये, लेकिन युवा धर्मगुरू दलाईलामा के मन में आस कायम थी कि वे  जल्द ही स्वदेश लौटेंगे ।
 इस दलाईलामा के सादगी भरे सच्चे प्रयासों का प्रतिफल ही कहा जा सकता है कि विश्व समुदाय और प्रभावशाली राष्टï, जिनके लिये 1959 में तिब्बत के कोई मायने नहीं थे , आज उसके चीन के साथ चल रहे विवाद को पूरी तरह जानते हैं । तिब्बत मसले की शांतिपूर्वक तरीके से सुलझाने के दलाईलामा के प्रयासों को विश्वभर से भरपूर समर्थन भी मिल रहा है । जहां दलाईलामा के धार्मिक प्रवचनों से प्रभावित होकर इस भौतिकवादी युग में विदेशियों  ने बड़ी संख्या में बौद्घ धर्म अपनाया है, वहीं उनके प्रयासों से भारत और दूसरे देशों में रह रहे निर्वासित तिब्बती सम्मान के साथ जीवन यापन कर रहे हैं । यह दलाईलामा की सोच थी कि तिब्बत की समृद्घ संस्कृतिऔर धार्मिक  विरासत को संजोये रखने के प्रयास हुए । इसकी झलक निर्वासित तिब्बत सरकार और संगठनों के बनाए भवनों , धार्मिक अनुष्ठïानों और उनकी दस्तकारी में देखने को मिलती है ।
अपने अहिंसात्मक अंदोलन के कारण दलाईलामा को शांति के लिए नोबल पुरस्कार से  से भी नवाजा गया है । निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री सोमदोंगे रिन्पोचे भी कहते हैं  कि तिब्बती अन्दोलन दलाई लामा के ही सानिध्य में अपने शैशव काल से आज तक यहां पÞंहुच पाया है। बकौल उनके जिम्मेवारियों का बंटवारा तो हो सकता है। लेकिन तिब्बति समाज व उसका अन्दोलन दलाई लामा से अपने आपको भला कैसे अलग कर सकता है। दलाई लामा की इस घोषणा को लेकर मेक्लोडगंज में भी खासी चरचा है। निसंदेह तिब्बती दलाई लामा के बिना अपने अन्दोलन को आगे तक ले जा भी पायेंगे कि नहीं इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है।

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